Parents Worship Day
                   - 14th February

            4.5 Million Children Participating Across The Globe So Far.
Saturday, June 23, 2018

पिता का अपमान, टी.बी. का मेहमान :-
    (पूज्य बापू जी के सत्संग-प्रवचन से)

    जो माता-पिता और गुरु की अवज्ञा करता है, उसको किसी-न-किसी जन्म में उसका फल भोगना ही पड़ता है। संत कबीर जी कहते हैं-

    कबीरा वे नर अंध हैं,
    हरि को कहते और, गुरु को कहते और।
    हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर।।


    जैसे गुरु का ठुकराया हुआ कहीं का नहीं रहता, ऐसे माता-पिता के अपराधी को भी चुकाना पड़ता है।

    बंगाल के फरीदपुर जिले का जितेन्द्रनाथ दास वर्मन नामक एक युवक टी.बी. (राज्यक्षमा) की बीमारी से इतना तो बुरी तरह घिर गया कि सारे इलाज व्यर्थ हो गये। कुलगुरु ने कहा कि "यह रोग इस जन्म का नहीं है, पूर्वजन्म के किसी पाप का फल है। तुम भगवान तारकेश्वर की पूजा करो, वे तुम्हारी कुछ मदद करेंगे।"

    उस युवक ने अपने कुलगुरु के आदेशानुसार भगवान श्री तारकेश्वर जी के मंदिर में पूजा-प्रार्थना प्रारम्भ कर दी। कुछ ही दिनों के बाद तारकेश्वर भगवान उसके स्वप्न में आये और कहाः "तूने पिछले जन्म में अपने पिता की अवज्ञा की थी, उनका अपमान किया था, उसी का फल है कि तू टी.बी. रोग से पीड़ित है और कोई इलाज काम नहीं कर रहा है। अब इस समय तेरा वह पूर्वजन्म का बाप फरीदपुर जिले के बड़े डॉक्टर श्री सत्यरंजन घोष के नाम से प्रसिद्ध है। तुम यदि उनकी चरणरज को ताबीज में मढ़ाकर धारण कर सको और प्रतिदिन उनका चरणोदक ले सको तथा वे संतुष्ट होकर तुम्हें क्षमा कर दें तो तुम ठीक हो सकते हो, इसके सिवाय दूसरा कोई उपाय नहीं है।"

    युवक ने स्वप्न की सारी बात अपने कुलगुरु को बतायी। कुलगुरु ने कहा कि "यह तारकेश्वर भगवान की कृपा है कि तुझे नामसहित पता भी बता दिया।" वह युवक डॉक्टर साहब के पास गया। स्वप्न की बात बतायी और बोलाः "आप पिछले जन्म के मेरे पिता हो। मैंने आपका अपमान किया था, आपकी अवज्ञा की थी जिसके कारण मुझे टी.बी. रोग हो गया है। अब आप मुझे सेवा का अवसर दो।"

    पूर्वजन्म  का पिता अभी डॉक्टर था। वह जानता था कि यह संक्रामक रोग। उसने जल्दी हाँ नहीं भरी। बोलाः "तू पिछले जन्म का बेटा होगा तो होगा लेकिन इस जन्म में मैं तुझे साथ में रखूँ और कहीं मुझे टी.बी. हो जाय तो ? तू अभी अपने घर जा। तुझे नीरोग करने के लिए मैं कैसे और क्या सहयोग दूँ, इसके लिए मैं मेरे गुरुदेव धनंजयदास व्रज-विदेही से पत्र-व्यवहार करके मार्गदर्शन लूँगा फिर तुझे समाचार भेजूँगा।"

    डॉक्टर सत्यरंजन घोष ने अपने गुरुदेव को सारा विवरण लिख भेजा। गुरुदेव ने कहाः "उसको घर में रखना तो खतरे से खाली नहीं, पड़ोस में कहीं मकान लेकर दो फिर भी उसके आने-जाने से गड़बड़ हो सकती है। उत्तम तरीका तो यह है कि उस युवक जितेन्द्रनाथ दास को अपना छायाचित्र दे दो और कह दो कि तुम अपने घर में ही रहकर इस फोटो को साक्षात् अपना पिता मानकर सेवा-पूजा करो और चरणामृत लिया करो। कभी मौका मिलेगा तो मैं तुम्हें अपनी चरण धूलि दे दूँगा, चरणामृत भी दे दूँगा। हिम्मत करो, तुम ठीक हो जाओगे।"

    उस डॉक्टर ने अपने गुरुदेव के बताये अनुसार टी.बी. से पीड़ित उस युवक को पत्र लिखकर भेज दिया। पत्र में लिखे अनुसार उस युवक ने छायाचित्र मँगवाकर पूजा प्रारम्भ कर दी। ज्यों-ज्यों पूजा करता गया, त्यों-त्यों उसका रोग मिटता गया। समय पाक पिछले जन्म का पिता, जो अभी डॉक्टर था, उसने अपना चरणोदक तथा चरणरज दे दी और बोलाः "मैंने तुझे माफ कर दिया।" वह युवक उसी समय ठीक हो गया। डॉक्टर ने परीक्षण करके देखा तो पाया कि अब उसके फेफड़ों में कोई दोष नहीं है। वह एक दिन डॉक्टर साहब के पास रहा, पुनः उनका चरणोदक पीकर तथा चरणरज लेकर वापस चला गया। इसलिए कभी माता-पिता से ऐसा व्यवहार न करें कि उनको दुःखी होना पड़े। लेकिन जो भगवान के रास्ते जाते हैं उन्हें यह दोष नहीं लगता।

    हमारे ऋषियों ने तो माता-पिता को देव कहकर पुकारा हैः

    मातृदेवो भव। पितृदेवो भव।

    एक बात और, मेरे पिताजी अंतिम समय में अर्थात् संसार से विदा लेते समय मेरी माँ के आगे हाथ जोड़कर बोलेः "कभी मैंने तुझको कुछ भला-बुरा कह दिया होगा, कभी हाथ में उठ गया होगा, उसके लिए तू मुझे माफ कर देगी तो ठीक होगा, नहीं तो मुझे फिर भोगना पड़ेगा। किसी जन्म में आकर तेरी डाँट-फटकार और पिटाई मुझे सहन करनी पड़ेगी।"

    मेरी माँ ने कहाः "अच्छा तो मुझसे भी तो कोई गलती हुई होगी, आप माफ कर दो।"

    बोलेः "हाँ-हाँ, मैंने माफ कर दिया।"

    आप भी मरो तो जरा यह अक्ल लेकर मरना। अब मरते समय याद रहे-न-रहे, अभी साल में एक बार आपस में एक दूसरे से माफ करा लिया करो। पति पत्नी, भाई-भाई, मित्र-मित्र लेखा चुकता करा लिया करो, जिससे दुबारा कर्मबंधन में पड़कर आना न पड़े। गहना कर्मणो गतिः। कर्म की गति बड़ी गहन है।

    न धन साथ चलेगा, न सत्ता साथ चलेगी, न चालाकी साथ चलेगी, साथ चलेगा धर्म, साथ चलेगा सत्कर्म, साथ चलेगा तुम्हारा आत्मा-परमात्मा। उसकी प्रसन्नता पाने के लिए करोड़ काम छोड़कर सत्संग कर ले, गुरु की शरण ले ले।

  
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