Parents Worship Day
                   - 14th February

            4.5 Million Children Participating Across The Globe So Far.
Saturday, June 23, 2018

 

मातृ-पितृ-गुरु भक्ति

अपनी भारतीय संस्कृति बालकों को छोटी उम्र में ही बड़ी उंचाई पर ले जाना चाहती है| इसमें सरल, छोटे-छोटे सूत्रों द्वारा ऊँचा, कल्याणकारी ज्ञान के हृदय में बैठाने की सुंदर व्यवस्था है| अपनी संस्कृति कहती है:
मातृदेवो भव । पितृदेवो भव । आचार्यदेवो भव ।
माता-पिता एवं गुरु हमारे हितैषी हैं, अतः हम उनका आदर तो करे ही, साथ ही उनमें भगवान के दर्शन कर उन्हें प्रणाम करें, उनका पूजन करें| आज्ञापालन के लिए आदरभाव प्रयाप्त है परन्तु उसमें प्रेम की मिठास लाने हेतु पूज्यभाव आवश्यक है| पूज्यभाव से आज्ञापालन बंधनरूप न बनकर पूजारूप, पवित्र रसमय एवं सहज कर्म हो जायेगा| पानी को ऊपर चढ़ाना हो तो बल लगाना पड़ता है| लिफ्ट से कुछ ऊपर ले जाना हो तो उर्जा खर्च करनी पड़ती है| पानी को भाप बनकर ऊपर उठना हो तो ताप सहना पड़ता है| गुल्ली को ऊपर उठने के लिए डंडा सहना पड़ता है| परन्तु प्यारे विद्यार्थियों! कैसी अनोखी है अपनी भारतीय सनातन संस्कृति कि जिसके ऋषियों-महापुरुषों ने इस सूत्र द्वारा जीवन उन्नति को एक सहज, आनंददायक खेल बना दिया| इस सूत्र को जिन्होंने भी अपना बना लिया वे खुद आदरणीय बन गए, पूजनीय बन गए| भगवान श्री राम ने माता-पिता व गुरु को देव मानकर उनके आदर-पूजन व सेवा की ऐसी मर्यादा स्थापित की कि आज भी 'मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की जय' कहकर उनकी यशोगाथा गायी जाती है| भगवान श्री कृष्ण ने नंदनंदन, यशोदानंदन बनकर नन्द-घर में आनंद की वर्षा की, उनकी प्रसन्नता प्राप्त की तथा गुरु सांदीपनी जी के आश्रम में रहकर उनकी खूब प्रेम एवं निष्ठापूर्वक सेवा की| उन्होंने युधिष्ठिर महाराज के राजसूय यज्ञ में उपस्थित गुरुजनों, संत-महापुरुषों एवं ब्राह्मणों के चरण पखारने की सेवा भी अपने जिम्मे ली थी| उनकी ऐसी कर्म-कुशलता ने उन्हें 'कर्मयोगी भगवान श्री कृष्ण' के रूप में जन-जन के दिलों में पूजनीय स्थान दिला दिया|
मातृ-पितृ एवं गुरु भक्तों की पावन माला में भगवान गणेशजी, पितामह भीष्म, श्रवण कुमार, पुंडलिक, आरुणि, उपमन्यु, तोटकाचार्य आदि कई सुरभित पुष्प हैं|
तोटक नाम का आद्य शंकराचार्य का शिष्य, जिसे अन्य शिष्य अज्ञानी, मूर्ख कहते थे, उसने 'आचार्यदेवो भव|' सूत्र को दृढ़ता से पकड़ लिया| परिणाम सभी जानते है कि सदगुरु कृपा से उसे बिना पढ़े ही सभी शास्त्रों का ज्ञान हो गया और वो 'तोटकाचार्य' के रूप में विख्यात व सम्मानित हुआ|
वर्तमान युग का एक बालक बचपन में देर रात तक अपने पिताश्री के चरण दबाता था| उसके पिताजी उसे बार-बार कहते : "बेटा! अब सो जाओ, बहुत रात हो गयी हैं|" फिर भी वह प्रेमपूर्वक आग्रह करते हुए सेवा में लगा रहता था| उसके पूज्य पिता अपने पुत्र की अथक सेवा से प्रसन्न होकर उसे आशीर्वाद देते:
पुत्र तुम्हारा जगत में, सदा रहेगा नाम| लोगों के तुमसे सदा, पूरण होंगे काम||
अपनी माताश्री की भी उसने उनके जीवन के आखिरी क्षण तक खूब सेवा की| युवा अवस्था प्राप्त होने पर उस बालक ने श्रीराम और श्रीकृष्ण की भाँति गुरु के श्रीचरणों में खूब आदर-प्रेम रखते हुए सेवा-तपोमय जीवन बिताया| गुरुद्वार पर सहे वे कसौटी-दुःख उसके लिए आखिर परम सुख का दाता साबित हुए| आज वही बालक महान संत के रूप में विश्व-वन्दनीय होकर करोड़ों-करोड़ों लोगों के द्वारा पूजित हो रहा है| यह महापुरुष अपने सत्संग में यदा-कदा अपने गुरुद्वार के जीवन-प्रसंगों का ज़िक्र करके कबीरजी का यह दोहा दोहराते है:
गुरु के सम्मुख जाय के सहे कसौटी दुःख| कह कबीर ता दुःख पर कोटि वारूँ सुख||
सदगुरु जैसा परम हितैषी संसार में दूसरा कोई नहीं है| 'आचार्यदेवो भव|' यह शास्त्र-वचन मात्र वचन नहीं है, यह सभी महापुरुषों का अपना अनुभव हैं| 'मातृदेवो भव । पितृदेवो भव । आचार्यदेवो भव । ' यह सूत्र इन महापुरुष के जीवन में मूर्तिमान बनकर प्रकाशित हो रहा है और इसी की फलसिद्धि है कि इनकी पूज्यनीय माताश्री व सदगुरुदेव - दोनों ने अंतिम क्षणों में अपना शीश अपने प्रिय पुत्र व शिष्य कि गोद में रखना पसंद किया| खोजो तो उस बालक का नाम जिसने मातृ-पितृ-गुरु भक्ति की ऐसी पावन मिसाल कायम की|
आज के बालकों को इन उदाहरणो से मातृ-पितृ-गुरु भक्ति की शिक्षा लेकर माता-पिता एवं गुरु की प्रसन्नता प्राप्त करते हुए अपने जीवन को उन्नति के रास्ते ले जाना चाहिए|